9 Comments

  1. किस आश में ‘विनयचंद ‘
    गिर कर संभल जाऐंगे ।
    मजदूरों और किसानों की
    विरले ही नकल लगाऐंगे।।
    —-बहुत ही शानदार पंक्तियाँ, बहुत सुंदर कविता, वाह

  2. “तन पे फटी है चादर जलती अंगीठी आगे।
    बैठे हैं खेतों के मेड़ पे सारी सारी रात जाने।”
    पूस की ठंड में किसानों की स्थिति और मेहनत का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करती हुई बहुत सुन्दर कविता

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