रखे रहो हाथो पे हाथ प्रिया ,
सोचती रहो कोई अनसोंची बात प्रिया,
सर्द हवा के झोंके में,
जरा- ठहर जाओ रात प्रिया,
हम मिलजुल कर सुख दुःख बाटेंगे,
जो मिलेगा जन्म जात प्रिया।
प्रिया (कविता)
Comments
5 responses to “प्रिया (कविता)”
-

👌👌👌👌👌
-
वाह बहुत सुंदर भाव प्रिया
-
अच्छी रचना
-

👏👏👏
-
अनुप्रास अलंकार का अच्छा प्रयोग
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.