तू शक्तिशाली!,मैं दलित !
तू स्वर्ण ! मैं नीच!
यह शब्द स्वार्थ में ,
तूने ही मुझे दिए।
तू मालिक, मैं दास,
तेरी विचारधारा में;
मेरा उपहास,
शोषण का खाता,
यहां हर रोज खुलता है,
अरे!कितना भी अनदेखा करो,
फर्क तो जरूर मिलता है।
जरा-सा खून का कतरा निकाल,
मेरा और अपना,
फिर देख!
मिला ,
मेरे वजूद के साथ अपना वजूद,
फर्क मिलेगा!
मगर नस्ल का नहीं ,
ना ही रूप का ,
हां! तेरी सोच के बीज का,
उच्च-नीच के बीच का,
भेदभाव चीखता,
तेरे अहम् में गुरुर लाजमी-सा
मिलता है !
फर्क तो जरूर मिलता है।
फर्क तो जरूर मिलता है।
Comments
12 responses to “फर्क तो जरूर मिलता है।”
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बहुत बहुत आभार 🙏
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दुःखी हृदय की वेदना को व्यक्त करती सुंदर कविता
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प्रगतिवादी चिन्तन,शोषक और शोषित में हो रहे भेदभाव को प्रकट करने की सफल कोशिश
बेहतरीन प्रस्तुति-

बहुत सुंदर समीक्षा बहुत बहुत धन्यवाद
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बहुत सुन्दर सर
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बहुत बहुत धन्यवाद सुमन जी
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हे मानुष,
तुम हर लिए मन की पीड़ा मेरी|
सच लिखने से ना उब सके,
धन्य है मानुष माया तेरी🙏🙏जितनी प्रशंसा करें कम है आपकी लेखनी को सलाम
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🙏🙏🙏 बहुत बहुत धन्यवाद , ऋषि जी
कभी कभी ये सच मुझको अपनो से दूर कर देता है
फिर भी आदत बुरी चीज होती है
इतना सम्मान देने के लिए दिल से अभिनंदन आपका 🙏
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बेहतरीन और मार्मिक भाव
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बहुत बहुत धन्यवाद शास्त्री जी
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🙏
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