फर्क तो जरूर मिलता है।

तू शक्तिशाली!,मैं दलित !
तू स्वर्ण ! मैं नीच!
यह शब्द स्वार्थ में ,
तूने ही मुझे दिए।
तू मालिक, मैं दास,
तेरी विचारधारा में;
मेरा उपहास,
शोषण का खाता,
यहां हर रोज खुलता है,
अरे!कितना भी अनदेखा करो,
फर्क तो जरूर मिलता है।
जरा-सा खून का कतरा निकाल,
मेरा और अपना,
फिर देख!
मिला ,
मेरे वजूद के साथ अपना वजूद,
फर्क मिलेगा!
मगर नस्ल का नहीं ,
ना ही रूप का ,
हां! तेरी सोच के बीज का,
उच्च-नीच के बीच का,
भेदभाव चीखता,
तेरे अहम् में गुरुर लाजमी-सा
मिलता है !
फर्क तो जरूर मिलता है।

Comments

12 responses to “फर्क तो जरूर मिलता है।”

  1. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    बहुत बहुत आभार 🙏

  2. दुःखी हृदय की वेदना को व्यक्त करती सुंदर कविता

  3. प्रगतिवादी चिन्तन,शोषक और शोषित में हो रहे भेदभाव को प्रकट करने की सफल कोशिश
    बेहतरीन प्रस्तुति

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      बहुत सुंदर समीक्षा बहुत बहुत धन्यवाद

  4. बहुत सुन्दर सर

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      बहुत बहुत धन्यवाद सुमन जी

  5. Rishi Kumar

    हे मानुष,
    तुम हर लिए मन की पीड़ा मेरी|
    सच लिखने से ना उब सके,
    धन्य है मानुष माया तेरी🙏🙏

    जितनी प्रशंसा करें कम है आपकी लेखनी को सलाम

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      🙏🙏🙏 बहुत बहुत धन्यवाद , ऋषि जी
      कभी कभी ये सच मुझको अपनो से दूर कर देता है
      फिर भी आदत बुरी चीज होती है
      इतना सम्मान देने के लिए दिल से अभिनंदन आपका 🙏

  6. बेहतरीन और मार्मिक भाव

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      बहुत बहुत धन्यवाद शास्त्री जी

  7. This comment is currently unavailable

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      🙏

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