12 Comments

  1. हे मानुष,
    तुम हर लिए मन की पीड़ा मेरी|
    सच लिखने से ना उब सके,
    धन्य है मानुष माया तेरी🙏🙏

    जितनी प्रशंसा करें कम है आपकी लेखनी को सलाम

    1. 🙏🙏🙏 बहुत बहुत धन्यवाद , ऋषि जी
      कभी कभी ये सच मुझको अपनो से दूर कर देता है
      फिर भी आदत बुरी चीज होती है
      इतना सम्मान देने के लिए दिल से अभिनंदन आपका 🙏

Leave a Reply