प्रियतमे तेरे स्वरूप का
कैसे वर्णन करूँ अब मैं,
सब उपमान सुंदरता के
आ गए पूर्व की कविता में।
काले बादल से सुन्दर बाल,
कमल की पंखुड़ियों से गाल,
झील सी आंख, शुक की सी नाक
हाथी सी मदमाती चाल ।
चाँद सा चेहरा, कोयल सी बोली
इन सब में अब तक तू तोली ,
फिर-फिर तुझको तोल रहा हूँ
तुला पुरानी है घटतोली।
अज्ञेय कह गए थे यह सब
उपमान हो गए मैले अब,
तब भी मैं इन उपमानों से
तुझे सजाता हूँ अब तक।
तेरी सुंदरता पर अब तक
मैं खोज न पाया नए शब्द
जिससे निस्तेज रही कविता
कलम रही मेरी निःशब्द।
फिर-फिर तुझको तोल रहा हूँ
Comments
14 responses to “फिर-फिर तुझको तोल रहा हूँ”
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सादर धन्यवाद विवेक जी
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वाह, और क्या चाहिए।श्रृंगार रस से सजी सुंदर रचना।
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सादर धन्यवाद जी
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जी विवेक जी, कोशिश करता हूँ। सादर धन्यवाद
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Osm
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सादर धन्यवाद
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अज्ञेय की ‘कलगी बाजरे की’ की कविता का सुंदर उद्धरण
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जी धन्यवाद
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nice
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सादर धन्यवाद जी
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वाह वाह बहुत सुंदर
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सादर धन्यवाद
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