यूँ तो हर रोज गुजर जाते हैं कितने ही लोग करीब से,
पर नज़र ही नहीँ मिलाते कोई इस बचपन गरीब से,
रखते हैं ढककर वो जो पुतले भी अपनी दुकानों में,
वो देखकर भी नहीं उढ़ाते एक कतरन भी किसी गरीब पे,
बचाते तो अक्सर दिख जाते हैं दो पैसे फकीर से,
पर लगाते नहीं मुँह को दो रोटी भी किसी बच्चे गरीब के॥
राही (अंजाना)
बचपन गरीब
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Comments
2 responses to “बचपन गरीब”
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Awesome
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बहुत ही उम्दा
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