बन्द मुट्ठी

बन्द मुट्ठी में कई राज़ दबाये बैठा हूँ,
अनगिनत शहीदों के कई नाम छुपाये बैठा हूँ,

मेरी खातिर होती रही हैं कितनी ही कुर्बानी,
मैं बेज़ुबान सही पर हर जवान की पहचान सजाये बैठा हूँ,

रंग भी गजब हैं और रूह भी अजब हैं ज़माने मे साहिब,
मगर मैं (तिरंगा)तीन रंगों में ही सारा हिन्दुस्तान समाये बैठा हूँ॥
राही (अंजाना)

Comments

9 responses to “बन्द मुट्ठी”

    1. Shakun Saxena Avatar

      धन्यवाद मित्र जय हिन्द

    1. Shakun Saxena Avatar

      धन्यवाद जी

      1. Abhishek kumar

        Bahut pahle se hai

  1. महेश गुप्ता जौनपुरी Avatar
    महेश गुप्ता जौनपुरी

    वाह

  2. Abhishek kumar

    सुन्दर रचना

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