बहती नदिया सी बह गई मैं

लोभी दुनियां में जी गई मैं,
विष का प्याला पी गई मैं
ना मीरा हूं ना नीलकंठ,
फिर भी सब झेल गई
मानों प्राणों पर खेल गई,
हुई भावहीन,हुई उदासीन
कंचन सी निखर गई,
टूटे मोती सी बिखर गई
अंतर्मुखी सब कहने लगे,
सबका कहना सह गई मैं,
बहती नदिया सी बह गई मैं

Comments

15 responses to “बहती नदिया सी बह गई मैं”

    1. Geeta kumari

      धन्यवाद..

    1. Geeta kumari

      Thank you mam

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद

      1. Abhishek kumar

        वेलकम

  1. Satish Pandey

    Very nice poem

    1. Geeta kumari

      Thank you very much 🙏

  2. Devi Kamla

    Bahut khoob

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद आपका कमला जी 🙏

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