बादल घिरे हुये हैं नभ में, गरज रहे हैं आज,
बूंदें बरस रही आंगन में, छम छम छम छम बाज।
ऐसे में तन पुलकित होकर, भीतर करता नाच,
बाहर जाने से डरता है, ठंडक की है आंच।
पौधे खुश हैं बहुत दिनों के, बाद नीर मिला है।
तरस गये थे सूख रहे थे, आज पीर मिला है।
पानी है तो जीवन है इस उदक सब सूना है,
पानी से ही धरणी में नव, अँकुर उग पाना है।
——————💐💐—- डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय
बादल घिरे हुये हैं नभ में
Comments
5 responses to “बादल घिरे हुये हैं नभ में”
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बहुत सुन्दर
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यह रचना ‘सरसी’ छन्द में है। जिसमें 16-11 की मात्रा का अनुक्रम है।
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बहुत खूब
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बहुत सुंदर
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वाह सतीश जी बहुत सुंदर छंद बद्घ रचना है।16-11की मात्रा का अनुक्रम है ।इस प्रकार मात्राओं की गिनती कर के छंद बनाना कवि सतीश जी की विशेषता है। कवि माहिर हैं इस कला में ।बहुत खूब।
बारिश में जब पौधों को पानी मिलता है तो पौधे भी खुश और हम भी खुश ,ऐसा ही होता है । यथार्थ चित्रण, अति सुन्दर रचना
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