बुढ़ापे का अकेलापन।

   ” बुढ़ापे का अकेलापन ”

बहुत ही मुसीबतों के दौर से गुजरा है,ये जीवन
पर किसे समझाऊं ? कैसे समझाऊं? और क्यो समझाऊं! जब कोई समझता ही नहीं है।

अपनों के दुख से; दर्द होता है ,बेहद
पर किसे बताऊं ? कैसे बताऊं? और क्यों बताऊं!
जब कोई साथ में, बतलाता ही नहीं है।

स्वार्थ की भुजाएं ,अब बहुत लम्बी हो गई,
और कैसे? पूरी करूं जरूरतें,
अब, उम्र भी कुछ ज्यादा  हो गई;
मगर ! आंखों में है ,बहुत सारा प्यार !
पर किसे जताऊं? कैसे जताऊं? और क्यों जताऊं!
जब कोई इन आंखों में झांकता ही नहीं है।

             ——मोहन सिंह मानुष

Comments

15 responses to “बुढ़ापे का अकेलापन।”

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      🙏

  1. Vasundra singh Avatar

    बहुत सुंदर रचना

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      धन्यवाद 🙏

  2. सुंदर चित्रण

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      🙏🙏

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      🙏

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      🙏

  3. Satish Pandey

    उपरोक्त पंक्तियों में यथार्थ सामने आया है, बुढ़ापे में तिरस्कार का शिकार हो रहे लोगों की संवेदना प्रस्फुटित हुई है, सरल शब्दावली में सच सामने आया है, बहुत खूब

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      बहुत ही सुंदर समीक्षा , बहुत बहुत आभार सर 🙏

  4. बुढ़ापे का अकेलापन आपने इस विषय पर लिखकर अपने साहित्य सृजन की क्षमता को उजागर किया है और बुढ़ापे में हो रही परेशानियों को अपनी कविता में पिरो कर सबके समक्ष प्रस्तुत करने की उम्दा कोशिश की है

  5. Pratima chaudhary

    बहुत सुंदर भाव
    लाजवाब रचना

  6. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    धन्यवाद

Leave a Reply

New Report

Close