8 Comments

  1. “हे भाग्य विधाता, बता इस पीङा में, क्या भला है ।
    जब मर्जी बिना तेरी एक पत्ता भी ,ना कहीं हिला है ।।
    हर जर्रे-जर्रे पर हक, बस तेरा ही नाम वदा है ।
    बता दे, तेरे दर पर, क्यूँ नहीं मुझे भी आसरा मिला है ।।”
    बहुत ही मार्मिक पंक्तियां
    अतिसुंदर रचना

  2. इस कविता से यह स्पष्टतः परिलक्षित हो रहा है कि कवि जीवन के प्रति गहरी दृष्टि रखती हैं। यह कविता मार्मिक होने के साथ-साथ गंभीर और चिंतन-प्रशस्त करने वाली है। यह कविता जीवनानुगत अनुभव से उपजी है जो कि पाठक तक सहजता से संप्रेषणीय है।

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