बेटा-बेटी

जब नारी का जन्म हुआ,
मां-बाप का चेहरा क्यूं सन्न हुआ
ये बात समझ ना पाती थी
जितना भी सोचूं उतनी ही उलझती जाती थी
हर गीत से लेकर कहानी तक
बचपन से लेकर जवानी तक
मैं डावांडोल सी रहती थी
ये दर्द मन ही मन सहती थी
“बेटा ही अच्छा होता है”
ऐसा क्यूं बोला जाता है
ये राज समझ ना पाती थी
मैं मन ही मन कुम्हलाती थी
फ़िर एक दिन मैंने ठाना
अपनी ये सोच बदले ज़माना
पुरानी पीढ़ी की सोच तो ना बदल पाई
अपनी अगली पीढ़ी को दूंगी संस्कार
बेटा-बेटी में फ़र्क ना करूं
यही होगी पुरानी सोच की हार
पीढ़ी बदली सोच भी बदली
बेटा-बेटी का फ़र्क मिटा
आज हमारी पीढ़ी ने
देखो ये इतिहास रचा
____✍️ गीता

Comments

8 responses to “बेटा-बेटी”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    अतिसुंदर भाव

    1. सादर धन्यवाद भाई जी🙏

  2. बहुत सुंदर कविता

    1. धन्यवाद पीयूष जी

  3. मार्मिकता भरी रचना

    1. बहुत-बहुत धन्यवाद प्रज्ञा जी

  4. बहुत ही अच्छी रचना

    1. धन्यवाद संदीप जी

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