बेटियाँ

गृह-वाटिका सी होती हैं बेटियाँ,
घर आँगन को सजा देती हैं बेटियाँ |
जैसे बिना चाँद के आसमान सूना सा लगता है,
वैसे बिना बिटिया के घर कोना सा लगता है |
कौन कहता है ! बेटियाँ परायी होती है,
अरे वह तो सबके दुःख में दवाई सी होती है |
जब कभी दिल कुछ उदास सा होता है,
आखिरी साँस में बिटिया ही पास होती है |
बेटा-बेटी का कभी ना भेद करना,
कोमल कली के दिल में कभी ना ये खेद करना |
समाज के दर्पण में पराया धन हैं बिटियाँ,
लेकिन सच्चे इन्साफ से मन का कंचन हैं बेटियाँ |

Comments

5 responses to “बेटियाँ”

  1. Harish Joshi U.K

    bahut sundar rachna

  2. बेटियों पर बहुत सुंदर कविता

    1. जी, आभार आपका |

  3. बेटी पर सुन्दर रचना, सुन्दर अभिव्यक्ति

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