भाव जगते नहीं क्यों मदद के

जी रहे हैं स्वयं हम
दिवास्वप्न में,
खुद को भूले हुए हैं
बड़े मग्न हैं।
पीठ संसार के दर्द
से फेरकर,
आँख सबसे चुराकर
बड़े मग्न हैं।
ओढ़ कर तीन कम्बल
पसीना हुआ,
उस तरफ वो निराश्रित
पड़े नग्न हैं।
भाव जगते नहीं क्यों
मदद के कभी
अश्व मन के
किधर आज संलग्न हैं।
पास में है सभी कुछ
नहीं तृप्ति है,
गांठ मन में हैं
भीतर से उद्दिग्न हैं।
तब भी सोये हुए हैं
दिवास्वप्न में,
यूँ ही पल पल गंवाते
दिवास्वप्न में।

Comments

16 responses to “भाव जगते नहीं क्यों मदद के”

  1. Geeta kumari

    गरीबों के लिए कोमल भाव जागृत करती हुए कवि सतीश जी की बहुत ही सुंदर रचना

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

  2. Virendra sen Avatar

    बहुत सारगर्भित अभिव्यक्ति

    1. Satish Pandey

      बहुत धन्यवाद

  3. Virendra sen Avatar

    धरती पर रहने वाले अमीरों और गरीबों के भाव प्रदर्शित करती रचना। बहुत खूब लिखा है आपने पांडेय जी।

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत आभार

  4. Antariksha Saha Avatar
    Antariksha Saha

    खूब कहा

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

  5. बहुत ही लाजवाब रचना

    1. Satish Pandey

      बहुत धन्यवाद

    1. Satish Pandey

      सादर आभार

    1. Satish Pandey

      धन्यवाद

  6. SANDEEP KALA BANGOTHARI

    बहुत ही सुंदर पंक्तियां

    1. Satish Pandey

      धन्यवाद जी

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