मगर मत तोड़ना ये तार

हां दोस्ती है,
इन दिनों रजाई से
उसको ओढ़े बिना नहीं कटते
सुनहरे पल पहाड़ी रातों के।
खुद की तारीफ के
न पुल बांधो
हम तो कायल रहे हैं वैसे ही
तुम्हारी नेह भरी बातों के।
परोसो मत
लजीज व्यंजन यूँ
हम तो खुश हैं खिला दो
केवल तुम,
दाल-चावल स्वयं के हाथों के।
व्यस्त हो
इन दिनों भले ही तुम
कम न हों पल
ये मुलाकातों के।
दूर रहना भले ही तुम
मुहब्बत की निगाहों से
मगर मत तोड़ना ये तार
अपने मन के नातों के।
—- डॉ0 सतीश चन्द्र पाण्डेय
(काव्यगत विशेषता- एक प्रयोग है, जिसमें प्रत्येक पद का अपना अलग-अलग पूर्ण अर्थ भी है, और संयुक्तार्थ भी हैं।)

Comments

10 responses to “मगर मत तोड़ना ये तार”

    1. Satish Pandey

      Thank you

  1. Awesome 👌👌👏👏👏👏👏👏👏👏👏

    1. Satish Pandey

      Thanks

  2. Praduman Amit

    बहुत ही सुन्दर।

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

  3. Geeta kumari

    बहुत सुंदर पंक्तियां

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

Leave a Reply

New Report

Close