वो आसां ज़िंदगी से जाके इतनी दूर बनता है,
कई मजबूरियाँ मिलती हैं तब मजदूर बनता है ।
वो जब हालात के पाटों में पिसकर चूर बनता है,
कई मजबूरियाँ मिलती हैं तब मजदूर बनता है..
कसक ये बेबसी की ज़ख्मी पैरों में दिखाई दी,
कभी लथपथ लहू से बिखरे कपड़ों में सुनाई दी..
जहाँ पर वेदना-संवेदना के तार बेसुध थे,
वहाँ पटरी पे बिखरी रोटियों ने भी गवाही दी ।
कहीं जब बेबसी का ज़ख्म भी नासूर बनता है
कई मजबूरियाँ मिलती हैं तब मजदूर बनता है..
वो जिसकी ज़िन्दगी हर रोज़ मिलती कामगारी हो,
वो तपती धूप से जिसके सफर की साझेदारी हो..
सफर भर पोछकर बच्चों के आँसू भी चला हरदम,
वो भूखे पेट होकर जिसने हिम्मत भी न हारी हो
पसीना जिस्म पर जब मेहनतों का नूर बनता है,
कई मजबूरियाँ मिलती हैं तब मजदूर बनता है..
#लॉकडाउन और मजदूर
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