माँ मेरी

संघर्षों में जीवन की तू परिभाषा कहलाती है,

रंग बिरंगी तितली सी तू इधर उधर मंडराती है,

खुद को पल- पल उलझा कर तू हर मुश्किल सुलझाती है,

खुली हवा में खोल के बाहें तू मन ही मन मुस्काती है,

आँखे बड़ी दिखाकर तू जब खुद बच्ची बन जाती है,

मेरे ख़्वाबों को वहम नहीं तू लक्ष्य सही दिखलाती है।।

जो भी मिले किरदार निभा कर दृष्टि में सबकी आती है,

बस एक माँ ही है जो हर दिल की पूरी दुनियाँ कहलाती है।।

राही (अंजाना)

Comments

28 responses to “माँ मेरी”

  1. Harish Avatar

    बहुत ही सुन्दर आपके द्वारा रचित कविता लाजवाब बेहतरीन बहुत ही उम्दा भाई जी

  2. Rinshu Avatar
    Rinshu

    Good lvu maa

  3. Sanket Avatar
    Sanket

    Nice sir ji

  4. Sumit Avatar
    Sumit

    Amazing poetry ??

  5. Kanchan Dwivedi

    Nice

  6. Satish Pandey

    वाह वाह

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