माँ मेरी

माँ मेरी
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मुझे मेरा खोया बचपन लौटा दे
विकल हुआ मेरा क्यूँ मन ,फिर आंचल लहरा दे
मुझे मेरा खोया बचपन लौटा दे ।
छूट गये क्यू खेल- खिलौने,
जिम्मेदारी से घिर गए सपने- सलौने ,
सबकी मुझसे उम्मीदें बङी हैं
इन हाथों में कहाँ जादू की छड़ी है
थक गयी मैं,थकान मिटा दे ।
मुझे मेरा खोया बचपन लौटा दे ।।
ईश्वर की धरती पर अवतार है तू
बच्चों की मनचाहा वरदान है तू
डूबते मन की खेवनहार है तू
तेरी ममता अविरल-निश्चल
स्नेह की प्यास बुझा दे ।
मुझे मेरा खोया बचपन लौटा दे ।।
सुमन आर्या

Comments

5 responses to “माँ मेरी”

  1. Geeta kumari

    अति सुंदर एवं भावपूर्ण रचना👏

  2. Shakti Kumar Tripathi

    Outstanding

  3. बहुत ही सुंदर इसे पढ़कर मुझे जगजीत सिंह के ग़ज़ल याद आ गई वह कागज की कश्ती

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