फिर याद आया मुझे, सावन के वो…. दो पहरी।
भीग रहे थे हम दो, थी हमारे पास एक ही छतरी।।
उनसे कभी चिपक जाना, फिर अलग हो जाना।
हवा के झोंको से कभी, उड़ जाती थी अपनी छतरी।।
धीरे धीरे कदमों से कदम, मिला कर आगे बढ़ना।
खींचातानी की आ जाती नौबत, थी एक ही छतरी।।
बूढ़े बरगद के नीचे ठहरना, मीठी मीठी बातें करना।
बात बात पे घुमाते थे, कभी कभी हम अपनी छतरी।।
सुनसान राहों में जब कोई राही पे, नजर पड़ जाता।
हम चेहरे को छुपा लेते थे, झुका के अपनी छतरी।। ।
(सावन में छतरी की भूमिका)
छतरी (काव्य प्रतियोगिता)
Comments
5 responses to “छतरी (काव्य प्रतियोगिता)”
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Good
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सुन्दर
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Nice
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सावन की यादे।
सुन्दर -
आपकी या रचना सावन के सभी सुमन दूर यादों को ताजा करते हैं
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