ये भी कैसा चाहत का मादक नशा
जिसमें सब ही लोग उलझे पड़े हैं।
अनुभवी सीढ़ियां इतनी पास खड़ी
पर कतराते उससे कितनी दूर पड़े हैं
आराम मनोरंजन के गुलाम बने हैं
घर गोदाम के जैसे चीजों से भरे हैं
प्रकृति नियमों से कोशों दूर खड़े हैं
जैसे जिंदगी के पेड़ उन्हीं से हरें हैं
शिक्षा के लिए उनके पीछे पड़े हैं
जो खुद ही अस्त व्यस्त बिगड़े हैं
पास में ही है शिक्षा का समंदर
अभिमान की चादर में अकड़े हैं
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