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  1. यह कवि गीता जी की संवेदनासिक्त रचना है। इस कविता ने सच्ची संवेदना में अपनी आवाज मिलाई है। इस कविता ने आज के पतनोन्मुख चरित्रों को उजागर किया है जो जरा सा लालच के चक्कर में आकर घटिया निर्माण करते हैं। औऱ उससे निरीह लोग जान से हाथ धो बैठते हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहा था, जैसे-जैसे सभ्यता विकसित होती जाएगी, कवि कर्म कठिन होता जाएगा। लेकिन आज भी विकसित होता समाज ऐसे कृत्य कर रहा है जिससे कवि की लेखनी सच कहे बिना नहीं रह पा रही है। बहुत ही यथार्थ चित्रण

    1. कविता की इससे सुंदर समीक्षा तो हो ही नहीं सकती है सर। यह समाचार सुनकर हृदय सच में व्यथित हो उठा था । इस प्रेरणादायक समीक्षा के लिए आपका हृदय से धन्यवाद सतीश जी🙏

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