मासूम बचपन कुचला जा रहा
भीतर से सहमा, बाहर से उददंड हुया
बिखरता हुया , गैज़ेटस के तले ,
अपनों के स्नेह-सानिध्य से वंचित
सहमा हुया, आयायों के तले ,
सर्वगुण- संपन्न बनाने की होड़ में
भागता हुआ, मृग मरीचिका के तले ,
सम्भाल लो,बचपन के खजाने को,
मासूम बचपन कुचला जा रहा।
मासूम बचपन
Comments
11 responses to “मासूम बचपन”
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बहुत आभार
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यथार्थपूर्ण अभिव्यक्ति, बहुत सुन्दर
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धन्यवाद
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बहुत खूब
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शुक्रिया
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समसामयिक यथार्थ चित्रण ।माता पिता दोनों नौकरी पेशा होते हैं तो बच्चे नौकरों के सहारे ही पलते हैं। एकल परिवारों की विडम्बना यही है।
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शुक्रिया
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Very nice
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Thanks
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जितनी तारीफ करें उतनी कम
लाजवाब रचना-

बहुत आभार
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