मिटा देना मसल कर तू

मिटा देना मसल कर तू
मेरी हस्ती को जूते से,
चींटी हूँ नन्हीं सी
क्या पता डंक मारूंगी।
मेरे जीने का हक बस तू
इसी चिन्ता में खा लेना
कि चींटी हूँ जरा सी
क्या पता कल डंक मारूंगी

Comments

21 responses to “मिटा देना मसल कर तू”

  1. Geeta kumari

    सामने वाले को आगाह करती हुई रचना है या छोटे लोगों की वेदना का चित्रण। मैं दुविधा में हूं।कृपया मार्ग – दर्शन करें सतीश जी

    1. Satish Pandey

      छोटे लोगों की वेदना का चित्रण है गीता जी,

      1. वाह, बहुत ही सुन्दर तरीके से छोटे लोगों की वेदना का वर्णन किया है आपने।आप बहुत सहृदय हैं ,सतीश सर।

      2. Satish Pandey

        भाव की गहराई तक आप जैसा सच्चा कवि ही पहुँच सकता है, सादर धन्यवाद

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

  2. बहुत-बहुत धन्यवाद अच्छी पोयम

    1. इस सुंदर टिप्पणी हेतु आपको हार्दिक धन्यवाद है ऋषि जी

    1. सादर धन्यवाद शास्त्री जी

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद

  3. बहुत बढ़िया

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

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