मुक्तक

बरसात हो रही है
मन झूम रहा है ऐसे
ऊँचे ऊँचे पेड़ों की
पंत्तियां
झूम रही हैं जैसे,
रिम झिम छम छम
छम छम छम छम

Comments

8 responses to “मुक्तक”

  1. Indu Pandey

    nice

  2. Vasundra singh Avatar
    Vasundra singh

    आपके काव्य में ध्वनिसूचक शब्दों की पहल से कविता का नाद सौंदर्य में इज़ाफ़ा हुआ है, आपकी कविता पढ कर निराला जी की कविता ‘झर झर झर निर्झर गिरि सर में’ याद आ गई

  3. पत्तियाँ।

  4. Satish Pandey

    सुन्दर प्रयास

  5. MS Lohaghat

    बहुत खूब, कम कम लिखो, लेकिन जब लिखो, अति सुंदर लिखो, यही होना चाहिए

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