आज लॉकडाउन खत्म हुए
तमाम दिन हुए
और आज मैं इतने
महीनों बाद बाजार गई
कुछ कपड़े खरीदने
बाजार पहले की तरह ही
सजा था
लग ही नहीं रहा था कि
कोरोना भी चला रहा था
सब व्यस्त थे
अपने-अपने में सब लगे थे
चाट, मटर, बताशे खूब बिक रहे थे
हलवाई तो सेठ लग रहे थे
कपड़ों की दुकानों पर भी
खचाखच भीड़ लगी थी
चूड़ी, बिंदी, लिपस्टिक भी
खूब बिक रही थी
सब्जी, फल वाले भी
आवाज लगा रहे थे
खरीददार भी उनसे
भाव-ताव कर रहे थे
मैं जब अपनी जानी-पहचानी दुकान पर
खस्ता खा रही थी
एकाएक मेरी नजर
एक बाबा पर गई
वो फुटपाथ पर डमरू बजा रहे थे
कोई उनकी दुकान पर भी
नजर डालेगा भगवान से
मना रहे थे
उनकी छोटी-सी दुकान पर
मुट्ठी भर सामान था
एक भी ग्राहक ना था
भरा-पूरा बाजार था
मेरा दिल भर आया
मन में सोंचा ये क्या कमाते होंगे
अपने घर का खर्चा कैसे चलाते होंगे !
मैं गई और भावुक होकर
पूँछा उनका हाल
वो बोलते-बोलते रूक गये
उनकी आँखों में भर आये अश्क अपार
मैंने खरीद लिया सब कुछ
कर दिया उन्हें खाली हाथ
कुछ गाड़ी थीं कुछ घोड़े थे
और तमन्चे, गुब्बारे थे
वो बाबा खुश थे और मेरा मन भी
मैं अपने घर वापस चल दी
कुछ खरीदने गई थी पर कुछ ना खरीदा
कुछ दुआएं और कुछ खिलौने लेकर
वापस आ गई
सच कहूँ अब मैं खुश हूँ, शान्त हूँ
कुछ भी खरीदने का मन अब नहीं है
पहली बार मैं बाजार करके तृप्त और संतुष्ट हूँ..
मुट्ठी भर सामान***
Comments
8 responses to “मुट्ठी भर सामान***”
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कवि प्रज्ञा जी के अति सुंदर भाव और अति सुन्दर कविता
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Thanks
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धरातल पर उपजी सच्ची संवेदना
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Thnx
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मजदूरों को देखा
भिखारियों को देखा
गांव के लोगों को देखा,
हमें तब पता चला
कोरेना जनता को नहीं
सिर्फ न्यूज़ वालों को हुआ|
,बहुत सुन्दर रचना-

Waah bahut khoob
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बहुत खूब
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Thanks
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