मेरा हृदय

बीती रात जब मैं यादों
के आगोश में जाने लगी
कल्पना के स्वर्ग में
तुमको जरा पाने लगी

तभी मेरा ह्रदय
वेदना की आग में तपने लगा
और यों कहने लगा
‘तुम भी क्या अनोखी चीज़ हो’
ना समझ पा रहा हूं मैं

खुद उलझाने अपनी बना
फँसती हो तुम, रोती हो तुम
और फिर बेचैन हो
रात भर जगती हो तुम

तुमसे मेरा रिश्ता कितना
पुराना है जानती हो?
मैंने तुमको कितनी दफा
यूं ही पल-पल मरते देखा है
और लाखों बार फिर
खुद में ही हंसते देखा है

ना जाने कितनी बार
देखा रतजगे करते हुए
कौमुदी में बैठ सपनों
को यूंही सँजोते हुए

Comments

22 responses to “मेरा हृदय”

  1. सुन्दर स्वाभविक रचना

  2. सुन्दर रचना

  3. Pragya Shukla

    थैंक यू

  4. Anil Mishra Prahari

    बहुत सुन्दर।

    1. धन्यवाद आदरणीय

  5. Amod Kumar Ray Avatar
    Amod Kumar Ray

    दिल से रचना।

    1. आभार आपका

  6. दिल से दिल तक

  7. भाव पूर्ण रचना

  8. Reema Raj

    सुन्दर

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