सावन पर कविताओं की बहार छाई है
मेरी कविता अभी तो ना तैयार होके आई है।
कहती है थोड़ा और बन संवर लूं …
अच्छी सी दिखूंगी थोड़ा और निखर लूं ।
सब को लिखते देख ,मेरा मन मचल उठा,
कविता बोली रुक जा, अभी बहुत रात हो आई है ।
………….✍️गीता…..
मेरी कविता..
Comments
22 responses to “मेरी कविता..”
-

काली घटा कहाँ रंग लाई है।
-

वाह क्या बात है। ।
-
धन्यवाद जी🙏
-
-
अच्छी-अच्छी कविताओं की बहार आने पर कवि मन का मचलना लाजमी है। यही सच्चे कवि की पहचान भी है। बहुत खूब।
-
कवियित्री के भाव समझने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद आपका सतीश जी 🙏….
सुन्दर समीक्षा हेतु आपका हार्दिक आभार ..
-
-

अतिसुन्दर
-
बहुत बहुत धन्यवाद आपका चंद्रा जी 🙏
-
-
अतिसुंदर भाव
-
बहुत बहुत धन्यवाद आपका भाई जी 🙏
-
-
कविता का मानवीकरण किया गया है।
-

बहुत ही बढ़िया कविता
-
सादर धन्यवाद सर 🙏
-
-

अतिसुंदर प्रस्तुति
-
बहुत बहुत धन्यवाद आपका मोहन जी 🙏
-
-

क्या खूब मानवीकरण किया है
-
बहुत शुक्रिया प्रज्ञा जी..
-
-

बहुत बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति
-
Thank you very much suman ji
-
-

बहुत खूब
-
शुक्रिया कमला जी 🙏
-
-

जबरदस्त लेखन
-
Thanks for your pricious complement Indu ji 🙏
-
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.