मेरे दिल का नज़राना

कभी मायूस होती हूँ कभी बेचैन होती हूँ
मगर तेरी मोहब्बत में डूबी दिन-रैन होती हूँ,
कभी बातें कभी यादें कभी तन्हाई में तुझको
भुलाकर सब ओ मेरी जान सिर्फ तुझमें ही खोती हूँ ।
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मेरे दिल का नजराना मुबारक हो तुम्हें साहिब
मेरे किस्से मेरे सपने मुबारक हो तुम्हें साहिब
जो ना दे सके तुमको चाहकर भी मेरे हमदम,
वो खुशियां और वो मंजिल मुबारक हो तुम्हें साहिब।
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इश्क फरमाते हो तुम भी इश्क फरमाते हैं हम भी
जरा पास आते हो तुम भी जरा पास आते हैं हम भी
बहुत मजबूर हैं हम यार दुनिया के उसूलों से,
अतः खामोश हो तुम भी अतः खामोश हैं हम भी ।

मोहब्बत ही मोहब्बत है तेरे जानिब मेरे जानिब
शरारत ही शरारत है तेरे जानिब मेरे जानिब
नजर आती हैं जब तेरी नजरें मेरी नजरों को,
आग ही आग लगती है तेरे जानिब मेरे जानिब।

Comments

7 responses to “मेरे दिल का नज़राना”

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  2. सुंदर गज़ल

  3. बहुत ही उम्दा

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