मनुष्य सोचता है
मंजिल दिखे तो ,
तब मैं मेहनत करूँ।
मंजिल सोचती है
मेहनत करे तो
उसे झलक दे सकूँ।
ऐसे में जिसने
कर्मपथ को अपना
कदम है बढ़ाया,
उसी ने हमेशा
मंजिल को पाया।
जिसने दिखाया
आलस्य खुद में
उसने स्वयं का
पथ भटका पाया।
जिसने निगाहों को
शिखर पर टिकाया
उसने स्वयं को
मंजिल में पाया।
जिसने भी मन अपना
भटका दिया,
उसने स्वयं को
अटका दिया।
कल के लिए काम
लटका दिया
उसने स्वयं को
झटका दिया।
मेहनत-मंजिल
Comments
8 responses to “मेहनत-मंजिल”
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अतिसुंदर रचना
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अति श्रेष्ठ रचना एवम् सुंदर लेखन
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सर्वश्रेष्ठ कवि और सदस्य की आपको बहुत-बहुत बधाई हो
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बहुत सुंदर कविता
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सर्वश्रेष्ठ कवि और सदस्य की बहुत-बहुत शुभकामनायें पाण्डेय जी
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ऐसे में जिसने
कर्मपथ को अपना
कदम है बढ़ाया,
उसी ने हमेशा
मंजिल को पाया
__________ कवि सतीश जी की बहुत ही सुंदर पंक्तियां, कि मेहनत करने से ही मंजिल मिलती है जो कर्म पथ पर चलेगा वही मंजिल को पाएगा। वाह, बहुत ही उच्च स्तरीय और श्रेष्ठ रचना -

सर्वश्रेष्ठ कवि पुरस्कार की बहुत बहुत बधाई
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सर शुभ प्रभात
सुंदर रचना
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