मेहनत

पसीना बहाना जरूरी है तेरा,
तभी तो कदम लक्ष्य चूमेगा तेरा।
सजग हो स्वयं को लगा श्रम पथ पर,
सवेरा है जग जा, आलस्य मत कर।
तेरी राह देखे खड़ी है बुलंदी
कर ले तू मेहनत से अक़्दबंदी,
निशाना लगा आंख पर मत्स्य के तू
पायेगा पल-पल फतह सत्य की तू।
परिश्रम का फल मिलेगा सभी को
लगा पेड़, फल-फूल देगा कभी तो।
कंटक रहित राह मेहनत होगी
तेरी सफल चाह मेहनत से होगी।
उलझन नहीं एक मंजिल पकड़ ले
जाने न दे हाथ से तू जकड़ ले,
नौका पकड़ एक, कर पार सरिता
यही जोश देती तुझे आज कविता।
——- सतीश चंद्र पाण्डेय, चम्पावत, उत्तराखंड

Comments

7 responses to “मेहनत”

  1. Geeta kumari

    “नौका पकड़ एक, कर पार सरिता यही जोश देती तुझे आज कविता।”
    मेहनत का पाठ पढ़ाती हुई कवि सतीश जी की बेहद प्रेरक रचना है
    पेड़ लगाएंगे तभी तो फल देगा, वाह बहुत लाजवाब अभिव्यक्ति
    सुन्दर लय बद्ध शैली सहित अत्यन्त उत्साह वर्धक कविता । लेखनी को अभिवादन

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

  2. Virendra sen Avatar

    बेहद प्रेरक रचना सतीश जी

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

  3. कर्म ही पूजा है बचपन से सुना है और यह सत्य भी है क्योंकि कर्म के बिना मनुष्य का शरीर बेकार हो जाता है
    जैसे किसी लोहे में जंग लग जाती है अगर उसका उपयोग ना किया जाए..
    यही भाव आपकी रचना में प्रखर रूप से नजर आया है…

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

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