मौन संवाद ईश्वर से
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हे ईश्वर!
मूर्त रूप में विद्यमान प्रेम हो तुम।
अस्पृश्य शब्द है ही नहीं शब्द कोष में तुम्हारे !
बेहद आलोकिक अनुभूति है तुम्हारे संसर्ग में,
इस रंग बदलते आसमान तले भी बसेरा है तुम्हारा।
मौन खड़े चुपचाप विध्वंस देखते हो!
सुकून बेचते हो अपने सानिध्य तले।
हृदय की घबराहट ,मन की छटपटाहट
अनायास ही खींच लेती है तुम्हारी ओर।
किस भाव है यह रहस्यमई प्रेम तुम्हारा?
आकर्षक, मोहक सुकून देने वाला।
यह सुनकर!
मधुर मुस्कान जो खिलती महसूस होती है मूर्त चेहरे पर तुम्हारे,
महसूस होती है हंसी
जैसे कह रहे हो,”जो मांग रहे हो वही पलड़े में रखना होगा!”
” खुद में से मै को हटा
मुझे स्थान देना होगा
मंजूर हो तो खुद को लगा दो दाव पर।”
आओ!
मैं तुम्हें हृदय से लगाने बाहें फैलाए खड़ा हूं।
क्या तुम बढ़ रहे हो मेरी ओर?
मुक्ति की राह पर
उजाले की ओर!
निमिषा सिंघल
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