रखो न हीन भावना बुलंद भाव से चलो,
सदैव सिर उठा रहे कभी नहीं कहीं झुको।
झुको उधर जिधर लगे कि सत्य की है भावना,
सिर उधर झुके न जिधर झूठ की संभावना।
तोलना किसी को है तो आचरण से तोल,
धन अधिक है कम है न कर आदमी का मोल।
बोलना है गर कभी तो बोल मीठे बोल,
नेह दे अगर कोई तो द्वार दिल के खोल।
आदमी सभी समान हैं नहीं ये भेद रख,
एकता की भावना से प्रेमरस का स्वाद चख।
सार्वभौम सत्य है कि प्रेम भावना रखो,
बुलंद मन बुलंद तन, बुलंद भावना रखो।
—— डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय
काव्य दिशा- दिगपाल मात्रिक छंद की इस काव्य रचना में 12-12 मात्राएं समाविष्ट हैं। कुल 24 का पद प्रस्तुत करने का प्रयास है।
रखो न हीन भावना (दिगपाल छंद में)
Comments
7 responses to “रखो न हीन भावना (दिगपाल छंद में)”
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बहुत ही बढ़िया भाव
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Wah bhut shaandar
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बहुत सुंदर अभिव्यक्ति
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बहुत खूब, अति सुन्दर
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बहुत ही सुंदर रचना
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बहुत बहुत सुन्दर रचना
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सही और सटीक शब्दों के साथ सुंदर रचना
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