धुंधले–धुंधले कोहरे में छिपती
रवि से दूर भागती
एक‘रश्मि’
अचानक टकरा गयी मुझसे
आलोक फैल गया भव में ऐसे
उग गये हो सैकडो रवि नभ मे जैसे
सतरंगी रश्मियों से
नभ सतरंगा सा हो गया
सैकडो इन्द्रधनुष फैल गये नभ में
पलभर में कोहरा कहीं विलीन हो गया
विलीन हो गयी वो ‘रश्मि’ भी
रवि के फैले आलोक में
ढूंढ रहा हूं तब से में
उस‘रश्मि’को
जो खो गयी दिन के उजाले में
न जाने कहां गुम हो गयी
मेरी वो‘रश्मि’
रश्मि

Comments
2 responses to “रश्मि”
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Good
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बहुत खूब, बहुत शानदार
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