रिमझिम-रिमझिम जल बरसा

रिमझिम-रिमझिम जल बरसा,
आ गए काले बादल
दिन में छाया घोर अंधेरा
नभ में जैसे फैला काजल
बादल की आंख से जल बरसा
धूप को ये सारा जग तरसा
सर्दी के मौसम में
और भी ठंडा मौसम हुआ
देखो ना…
सब कुछ कितना निर्मल हुआ
लगता है सब धुला-धुला सा
अब मौसम हो गया खुला-खुला सा
धूल निकली वृक्ष, लताओं की
ठंडी-ठंडी पवन चली है
हरित पर्ण हिला-झुला कर,
दिखा रही है शान अपनी अदाओं की
कोहरा भी छंट गया,
कितना स्पष्ट सा दिख गया
______✍️गीता

Comments

14 responses to “रिमझिम-रिमझिम जल बरसा”

  1. बहुत ही सुन्दर ।

    1. बहुत-बहुत धन्यवाद सुमन जी

  2. बहुत खूब, अति सुन्दर

    1. बहुत-बहुत धन्यवाद पीयूष जी

  3. बहुत ही सुंदर

    1. Geeta kumari

      बहुत-बहुत धन्यवाद प्रज्ञा

    1. बहुत बहुत धन्यवाद भाई जी 🙏

  4. Satish Pandey

    हरित पर्ण हिला-झुला कर,
    दिखा रही है शान अपनी अदाओं की
    कोहरा भी छंट गया,
    कितना स्पष्ट सा दिख गया”
    —- कवि गीता जी की बहुत ही बेहतरीन रचना है यह। अति उत्तम भाव और सहज शिल्प, बहुत खूब

    1. Geeta kumari

      इतनी सुन्दर समीक्षा हेतु आपका बहुत बहुत धन्यवाद सतीश जी

  5. गीता जी को सर्वश्रेष्ठ आलोचक और सर्वश्रेष्ठ सदस्य सम्मान की बहुत बहुत बधाई। वास्तव में आपकी समीक्षा very nice होती हैं। और कविताएं भी उत्तम

    1. Geeta kumari

      बहुत-बहुत धन्यवाद चंद्रा जी । सराहना के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया

  6. गीता जी, आपको सर्वश्रेष्ठ आलोचक और सर्वश्रेष्ठ सदस्य सम्मान प्राप्त होने पर हार्दिक बधाई।

    1. Geeta kumari

      बहुत-बहुत धन्यवाद सतीश जी
      आपको भी सब श्रेष्ठ कवि की बधाई

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