रौशनी की आस

ज़िंदगी की तपिश बहुत हमने सही,
ये तपन अब खलने लगी।
रौशनी की सदा आस ही रही,
रौशनी की कमी अब खलने लगी।
बहुत चोटें लगीं, बहुत घाव सहे
सहते ही रहे कभी कुछ ना कहे,
वो घाव अब रिसने लगे,
मरहम की कमी सब खलने लगी।
औरों को दिए बहुत कहकहे,
अपने हिस्से तो .गम ही रहे।
ये .गम अब मेरे हिस्से बन चले,
.खुशियों की कमी अब खलने लगी।
रौशनी की सदा आस ही रही,
रौशनी की कमी अब .खलने लगी।

Comments

10 responses to “रौशनी की आस”

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत शुक्रिया 🙏

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    तपिश सहकर तू एक दिन कुन्दन बनेगी।
    निराश न हो बहना सर्वन की कुण्डल बनेगी।।
    बहुत खूब। अतिसुंदर।।

    1. Geeta kumari

      ह्रदय की गहराइयों से आपका आभार और धन्यवाद भाई जी🙏

  2. सुन्दर रचना

    1. Geeta kumari

      बहुत बात शुक्रिया आपका🙏

  3. Devi Kamla

    वाओ

    1. Geeta kumari

      Thank you very much Kamla Ji 🙏

  4. Piyush Joshi

    Waah waah

    1. Geeta kumari

      Thank you very much Piyush ji 🙏

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