वो मेरी बचपन की सखी

वो मेरी बचपन की सखी,
मिली मुझे कितने दिन बाद
जानती थी मैं ये कबसे,
आएगी उसे एक दिन मेरी याद
घर गृहस्थी में व्यस्त रही थी,
चेतन मन में थे कितने काम
पर अवचेतन मन में थी मैं कहीं ना कहीं,
ये उसको भी ना था भान
जब फुर्सत के क्षण आए तो,
याद आई होंगी बचपन की बातें
यूं ही तो नहीं छूटते बचपन के प्यारे नाते
रोक ना पाई वो खुद को, संदेशा भिजवाया मुझे
मैं भी भागी भागी आई, कितने दिन बाद वो पाई
वो मेरी बचपन की सखी….

Comments

10 responses to “वो मेरी बचपन की सखी”

    1. Geeta kumari

      धन्यवाद🙏

  1. Geeta kumari

    Thank you mam🙏

  2. Vasundra singh Avatar
    Vasundra singh

    बहुत सुन्दर काव्य रचना

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद🙏

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद 🙏

  3. अक्सर ऐसा ही होता है दोस्त

  4. Devi Kamla

    Waah waah

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