शोर…

शोर भीतर भी है।
शोर बाहर भी है ।
ये ऐसा मंथन हैं।
जो चलता रहता है।
गुंजता रहता है।
हम शांत नहीं कर पाते।
बस बना लेते हैं।
शोर को अपनी आदत का हिस्सा।

Comments

12 responses to “शोर…”

  1. Praduman Amit

    हम आदत से लाचार हो कर किसी के हिस्सा बन कर रह जाते है।
    तब शुरू होती है हमारी जीवन की पहली अध्याय।

  2. Pratima chaudhary

    धन्यवाद सर

    1. Pratima chaudhary

      धन्यवाद सर

  3. मोहन सिंह मानुष Avatar

    अशांति का वातावरण चारों तरफ विद्यमान है
    फिर इंसान उसे अपनी आदत का हिस्सा बना ही लेता है
    बहुत सुंदर पंक्तियां

  4. Pratima chaudhary

    सुन्दर समीक्षा के लिए हार्दिक धन्यवाद

  5. सुन्दर अभिव्यक्ति

    1. धन्यवाद जी

  6. वाह क्या बात है

    1. धन्यवाद सर

  7. Deep

    बहुत सुंदर पंक्तियां

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