अहो, कविता!!
तुम तो
बहुत ही खूबसूरत हो,
सजाकर भाव रसना से
मधुर अभिव्यक्ति करती हो।
जीवन का सुख व दुख
सब कुछ समेटे हो
स्वयं में तुम,
समझ संवेदनाओं को
विलक्षण रूप देती हो।
जरा सी पंक्तियों में तुम
बड़ी सी बात कहती हो
सहृदय में विचरती हो
दिलों में राज करती हो।
जहां कोई न पंहुचा हो
वहां तक तुम पहुंचती हो,
बनी जीवन का आईना तूम
सुखद राहें दिखाती हो।
सजाकर भाव रसना से
Comments
10 responses to “सजाकर भाव रसना से”
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वाह सर, कविता पर बेहतरीन कविता
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बहुत बहुत धन्यवाद जी
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वाह वाह बहुत खूब
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सादर आभार
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वाह, कवि सतीश जी ने कविता की बहुत ही सुन्दर शब्दों में सराहना की है “जरा सी पंक्तियों में तुम बड़ी सी बात कहती हो सहृदय में विचरती हो दिलों में राज करती हो।” कविता का अति सुंदर मानवीकरण किया है ,और बताया है कि कविता कम पंक्तियों में बड़ी बात कहने में सक्षम होती है ।बहुत सुंदर भवाभिव्यक्ति , सुंदर शिल्प और सुंदर प्रस्तुति ।
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कविता का इतना सुंदर विश्लेषण, इतनी सुंदर समीक्षा हेतु धन्यवाद शब्द कुछ भी नहीं है। कविता के भाव का बहुत ही सुंदर ढंग से विश्लेषण करने हेतु आपको अभिवादन है। गीता जी
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अतिसुंदर भाव
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सादर धन्यवाद
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बहुत खूब
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सादर धन्यवाद प्रज्ञा जी
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