सब ओर खुशी छा जाये
दुख की छाया पड़े न किसी में।
मन मानव का होता है कोमल
आशा होती है मन में,
आशा टूटे कभी न किसी की,
दिल टूटे न कभी भी,
इच्छा आधी रहे न किसी की।
इच्छा ऐसी रहे न किसी में
जिससे चैन हो छिनता,
पूरा हो प्रयत्न पाने का
भीतर रहे न भीतर चिंता।
भीतर चिन्ता खा देती है
बाहर है संघर्ष कड़ा
अतः मनोबल रख कर मन में
हो जा मानव आज खड़ा।
सब ओर खुशी छा जाये
Comments
11 responses to “सब ओर खुशी छा जाये”
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Wow very nice
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Thank you
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सब ओर खुशी छा जाये
दुख की छाया पड़े न किसी में।…
बाहर है संघर्ष कड़ा
अतः मनोबल रख कर मन में
हो जा मानव आज खड़ा।
………….. संघर्ष और मनोबल बढ़ाती हुई कवि सतीश जी की उच्च स्तरीय रचना । बहुत सुंदर शिल्प और भाव सहित लाजवाब लेखन।-
इस प्रेरणादायक समीक्षा हेतु बहुत बहुत धन्यवाद। श्रेष्ठ समीक्षक लेखनी को अभिवादन
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बहुत खूब वाह
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बहुत बहुत धन्यवाद
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अतिसुंदर रचना
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सादर धन्यवाद सर
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बहुत लाजवाब रचना
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बहुत बहुत धन्यवाद
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Great 👍
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