सम्बन्ध

रिश्तों की डोर मे मजबूरियों का यह क्या सिला है,
अपनों के बीच यह कैसा नफ़रत का फूल खिला है

गुलिस्तां महकता था कभी जिनकी किलकारियों से,
खुश्बू बिखरती थी कभी बागीचे की फुलवारियों से
सींचता था जो प्यार से उसे बिखरा चमन मिला है,
रिश्तों की डोर मे मजबूरियों का यह क्या सिला है

सच्ची चाहतों के भंवर मे फंसी यह कैसी जिंदगी है,
इन पत्थर दिलो के लिए यह कैसी बंदिगी है
मुझको भी क्यों ना बनाया उनसे यह गिला है,
रिश्तों की डोर मे मजबूरियों का यह क्या सिला है

बढ़ते फासले दरमियान के कहाँ तक जायेंगे
दूर होकर भी एक दूजे को बहुत याद आयेंगे
देख कर दुनिया के दावों को ऊपर वाला भी हिला है,
रिश्तों की डोर मे मजबूरियों का यह क्या सिला है

अनसुलझे सवालों के साथ पहेली यह जीवन रेखा,
जवाबो को ढूंढ़ती मैंने अपनी ज़िन्दगी को देखा
दांव पर लगी ज़िंदगियों का यह क्या सिलसिला है,
रिश्तों की डोर मे मजबूरियों का यह क्या सिला है
अपनों के बीच यह कैसा नफ़रत का फूल खिला है

पंकज प्रिंस

Comments

5 responses to “सम्बन्ध”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    अतिसुंदर रचना

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