धीरे-धीरे चुपके चुपके
पड़ रही है साँझ
हम भीतर ही थे
पता ही नहीं चला कि
कब आई दबे पांव साँझ।
अभी तो उजाला था,
चहक रही थी चिड़ियाएं,
दिख रही थी
चारों ओर के पहाड़ों की छटाएं।
अब झुरमुट अंधेरा छा रहा है,
शहर शांत हो रहा है।
बिलों में छुपे चूहों का
सवेरा आ रहा है।
दिन भर किसी का समय था
अब रात किसी का समय आ रहा है।
बता रहा है कि
सभी का समय आता है
दिनचरों का भी रात्रिचरों का भी
बस समझने की बात यही है कि
समय का सदुपयोग
कौन कर पाता है
साँझ
Comments
6 responses to “साँझ”
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वाह पाण्डेय जी, सुन्दर शब्द चित्र
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साँझ का सुंदर मानवीकरण
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कवि सतीश जी ने सांझ का बहुत ही मनोरम चित्रण किया है ।
पर्वतों की सांझ ,और धीरे धीरे होता अंधेरा बहुत ही सुंदर लग रहा है ।
समय के सदुपयोग करने की बहुत अच्छी बात भी कही है ।
प्राकृतिक सौंदर्य की बहुत ही शानदार प्रस्तुति -

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अतिसुंदर
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