तुम रहती हो तो
सावन पर बहार रहती है..
तुम्हारे दम से ही तो
सावन की महफिल सजती है..
सूना हो जाता है सावन
आ जाती है पतझड़,
जो तुम एक दिन भी नहीं आती हो..
जैसे ही आती हो
रोम रोम खिल उठता है
सावन जी उठता है..
सावन जी उठता है
Comments
5 responses to “सावन जी उठता है”
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बहुत ख़ूब
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कहीं पर लग रहा है तुकांत वाली है कहीं पर लग रहा है अतुकांत है फिलहाल पूरी कविता में कनफ्यूज़ ही रही…
रोम-रोम होना चाहिए था सर..
आपने ंअपनी कविता में लुप्तोपमा अलंकार का प्रयोग किया है जो बहुत कम लोग करते हैं वो भी शायद गलती से किया है पर अच्छा है…
कविता लिखने के लिए साहित्य का ज्ञान होना भी आवश्यक है मेरी राय है पढ़ा भी कीजिए और व्याकरण
सम्बंधी त्रुटियां आपसे हो जाती हैं जैसे योजक चिह्न और चन्द्रबिंदु वाली वो भी ठीक कीजिए…
भाव अच्छा है पर शिल्प बेढंग है बिखरा है पर शीर्षक उम्दा है-

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वाह वाह
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Nyc
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