साहित्य लिखो क्यों तुम आपस में लड़ते रहते हो कभी तुम जीतो कभी वो हारे क्यों जीत-हार में रोते हो पैसे कमाने के साधन तो दुनिया में हैं बहुत पड़े साहित्य लिखो क्यों पुरस्कार की […]

बड़ी बात करते हैं लोग पर बड़ा ह्रदय ना रखते हैं कुछ अभिलाषा मन में जागे तो फिर कुबड़ाई करते हैं लेखनी को दूषित करते हैं अपनी कुत्सित सोंच से दूसरे की ना सुनते बस […]

आलोचना का जिम्मा फिर से उठा लिया तूने चल अच्छा है ये काम संभाल लिया तूने साहित्य के मंच पर दूरियां अच्छी नहीं लगती जैसे-तैसे दिल को मना लिया तूने…

हाँ, सही कहा तुमने बुरा हूँ मैं कवि कहाँ आवारा पागल हूँ मैं सिर्फ सूरत ही मेरी अच्छी है दिल का बहुत काला हूँ मैं एक बात तो मान लो मेरी लाख बुरा हूँ पर […]

तुम्हारी कविता प्रोफाइल पर पढ़ता हूँ.. जब पढ़ता हूँ जी उठता हूँ, यूं तो सहमा सहमा सा रहता हूँ.. पर तुम्हारे लिए हमेशा लड़ पड़ता हूँ जाने क्या है जानता नहीं हूं मैं, पर जो […]

तुम रहती हो तो सावन पर बहार रहती है.. तुम्हारे दम से ही तो सावन की महफिल सजती है.. सूना हो जाता है सावन आ जाती है पतझड़, जो तुम एक दिन भी नहीं आती […]

वो खिड़की भले ही बंद रहती है पर, महसूस तुम्हें ही करता हूँ.. तुम्हारे सो जाने के बाद भी, तुम्हारी याद में देर तक जगता हूँ.. सोचता यही हूँ देखकर चाँद की ओर, मेरा चाँद […]

जाना चाहता हूँ ये शहर छोंड़कर पर असफल हूँ क्योंकि यहाँ कि एक कवयित्री से प्यार करता हूँ हूँ पुलिसवाला मगर डरता हूँ इजहार करने से क्योंकि प्यार से ज्यादा उसका सम्मान करता हूँ…

लिखने का शौक जरा कम ही है मुझे पर तेरा लिखा हर पन्ना पढ़ा करता हूँ… हर बार गलतियों पर जुबां बोल पड़ती है बस यही गुनाह बार-बार करता हूँ…