सिद्ध अब यह हो गया है
सब तरफ से हैं गलत हम,
ठोकरें देते रहे हैं,
दूसरों को हर बखत हम।
भावनाएं खुद हमारी
हैं गलत तुमसे कहें क्या
खुद के खुद दोषी बने हैं
और की बातें करें क्या।
सिद्ध अब यह हो गया है
Comments
11 responses to “सिद्ध अब यह हो गया है”
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अपनी गलती मान लेना बहुत बड़ी बात होती है सतीश जी। सैल्यूट🙋
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सादर अभिवादन, आपकी स्नेहमयी लेखनी सत्य की ओर प्रेरित करती है।
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🙏🙏
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सुंदर
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बहुत बहुत धन्यवाद जी
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बहुत सुन्दर ।
अपनी खामियों को स्वीकार कोई विरला ही कर पाता है ।
प्रेरणादायक ।-
सुंदर समीक्षा हेतु हार्दिक धन्यवाद, आपकी टिप्पणी नवीन ऊर्जा का संचार करेगी
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Very nice
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Thanks ji
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बढ़िया कविता
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धन्यवाद जी
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