किसी की रूसवायी की वज़ह क्यूँ बनें
ऐ मेरी जिंदगी, चलो हम ही चले जाते हैं ।
औरों की परेशानी का सबब क्यूँ बने
किसी की आँखों की चुभन क्यूँ बने
तेरा चैन यूँ ही बना रहे, चलो हम ही चले जाते हैं ।
क्यूँ किसी से गिला हम करें
क्यूँ किसी की हसरतो से हम जले
सारे स्वप्न पलकों पे लिए, चलो हम ही चले जाते हैं ।
कयी उम्मीदों के सुमन थे तुमसे खिले
बिखर गए सब, कयी ज़ख्म ऐसे तूने दिये
कोई आश फिर से पले, चलो हम ही चले जाते हैं ।
हम ही चले जाते हैं
Comments
7 responses to “हम ही चले जाते हैं”
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सुंदर
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सादर आभार
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समर्पण भाव को प्रदर्शित करती हुई बहुत सुंदर कविता
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बहुत बहुत धन्यवाद
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अत्यंत सुंदर कविता का सृजन किया है आपने। वाह
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सादर आभार
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व्यथित हृदय की वेदना को बहुत ही सुन्दर शब्दों में पिरोया है आपने सुमन जी। आपकी रचना काबिले तारीफ है।
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