कविता-होगा कोई लोभी
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होगा कोई लोभी,
होगा कोई ना समझ,
जो तुम्हें खरीदे रुपयों में
वरना तुम्हारी कीमत चवन्नी से भी कम है,
अरे….
होगा कोई आंख का अंधा,
जो तुम्हारी सूरत को ,उगता चांद कहे,
मेरी नजर में तुम बदसूरत सूरत हो,
क्योंकि कवि बिन देखे कुछ नहीं कहता।
होगा कोई कामी पुरुष,
दिल में जगह पाने के लिए,
सच्चाई ना कहके के बढ़ाई करें,
लंगड़ी काली कानी बदसूरत को भी,
अप्सरा मेनका से तुलना करें,
बात बात पर तुम्हें हँसाये
सपनों में लेकर चांद पर जाए,
सच्चाई को देखता नहीं
मां बाप का पैसा तुम पर उड़ाए,
खरीदी होती कुछ किताबें,
तुम्हें देता मुझे एतराज नहीं,
एतराज मुझे इस बात से है,
तुमने उसे घुमाया-
पर पढ़ने के लिए कहा नहीं
वो अंधा था,
वो पागल था,
बंदे में हर गुण था,
लोगों को कैसे परखे,
उसमें यह समझ नहीं था,
परखा होता तुम्हें अगर,
यह अच्छे घर की निशानी नहीं,
यह अच्छे संस्कारों में पली नहीं
यह रावण की बहन इच्छाधारी सूपनखा है
किसी अच्छे भाई की बहन नहीं है,
मेरे देश की हर बेटी,
सीता मरियम राधा मीरा-
के पद चिन्हों पर चलती है,
यदि कोई उल्लंघन करके चलती,
और रावण की बहन है
विभीषण की बहन नहीं|
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कवि-ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’-
होगा कोई लोभी
Comments
5 responses to “होगा कोई लोभी”
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ओह !
इतनी ओजपूर्ण तथा क्रोधपूर्ण रचनाअति उत्तम सच ही कहा ऐसी लड़कियां रावण की बहन ही हो सकती हैं विभीषण की नही
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बहुत सुन्दर कविता ऋषि
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