ღღ_मैं भी लिक्खूँगा किसी रोज़, दास्तान अपनी;
मैं भी किसी रोज़, तुझपे इक ग़ज़ल लिक्खूँगा!
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लिक्खूँगा कोई शख्स, तो परियों-सा लिक्खूँगा;
ग़र गुलों का ज़िक्र आया तो, कमल लिक्खूँगा!
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बात ग़र इश्क़ की होगी, तो बे-इन्तहा है तू;
ज़िक्र ग़र तारीख का होगा, तो अज़ल लिक्खूँगा!
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मैं लिक्खूँगा तेरी रातों की, मासूम-सी नींद;
और अपनी बेचैन करवटों की, नक़ल लिक्खूँगा!
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हाँ ज़रा मुश्किल है, तुझे लफ़्ज़ों में बयां करना;
फिर भी यकीन मानो साहब, मुकम्मल लिक्खूँगा!
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ये जानता हूँ “अक्स”, कि तुझे झूठ से नफरत है;
इसलिए जो भी लिक्खूँगा, सब असल लिक्खूँगा!!….#अक्स
“ग़ज़ल लिक्खूँगा!”

Comments
4 responses to ““ग़ज़ल लिक्खूँगा!””
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kya baat he ankit ji
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shukriya Sridhar bhai……
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Good
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वाह बहुत सुंदर
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