गांव की ज़िन्दगी ,अब पहले जैसी नहीं….

गांव की ज़िन्दगी ,अब पहले जैसी नहीं
जहाँ रिश्ते तो हैं ,वह मिठास नहीं
जहाँ मिट्टी तो है ,पर खुशबू नहीं
जहाँ तालाब तो है ,पर पानी नहीं
जहाँ आम बौराते तो हैं ,पर सुगन्ध का महकना नहीं
गांव की ज़िन्दगी ,अब पहले जैसी नहीं
यहाँ लोग बेगाने से हो गये
लोग सुख साधन के भूंखे हो गये
गांव अब शहरों में तब्दील हो गये
गांव अब चकाचौंध से लबरेज हो गये
बुजर्गों के आशिर्वाद में
जो स्नेह कीर्ति का भाव था
पाश्चात्य संस्कृति में ,कहीं विलुप्त हो गया
मिल जुल कर पर्व मनाने की भावना
अलगाव समय रूपी भट्ठी में जल गयी
गांव की ज़िन्दगी ,अब पहले जैसी नहीं
आदमी को आदमी से मिलने की फुर्सत कहाँ
इन्सानियत और भाईचारा शहरीकरण में खो गया
आधुनिकता का नशा हर व्यक्ति पर छा गया
जो छलकता था प्यार ,वो दिखावा बनकर रह गया
पैसों के लिए हर शख्श पलायन कर गया
विश्वास का घर अब खण्डहर बन गया
गांव की ज़िन्दगी ,अब पहले जैसी नहीं….

Comments

13 responses to “गांव की ज़िन्दगी ,अब पहले जैसी नहीं….”

  1. himanshu ojha

    Very nice
    Please AP Meri kavita “azaadi” padhke bataeye kaisi hai

    1. Prabhat Pandey

      Thanks

    2. Prabhat Pandey

      OK sir, I will read your poem

  2. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    बहुत ही बेहतरीन रचना ,
    सच में इंसान बहुत बदल गया है
    चाहे फिर गांव हो या फिर शहर हो।

    1. Prabhat Pandey

      Thanks

    1. Prabhat Pandey

      Thanks ma’am

    1. Prabhat Pandey

      Thanks

    1. Prabhat Pandey

      Thanks

  3. वाह प्रभात सर

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