दरिया था कभी मुझमे..

‘ये मेरी मोहब्बत की, शिद्दत का सिलसिला था,
दरिया था कभी मुझमे, अब उससे जा मिला था..

ज़िद थी गज़ब की मुझमे, तुझको जीताने की,
हर बार हारकर भी, जीता जो हौसला था..

मुझमे रवाँ तू जितनी, पर उतना मैं नही हूँ,
बरसों की शिकायत थी, मुद्दत से ये गिला था..’

दरिया था कभी मुझमे, अब उससे जा मिला था..

– प्रयाग

Comments

8 responses to “दरिया था कभी मुझमे..”

  1. वाह क्या बात है

    1. शुक्रिया सतीश जी

    1. Prayag Dharmani

      बहुत आभार आपका

  2. Geeta kumari

    बहुत सुंदर

    1. धन्यवाद जी

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