जिससे ठोकर लगी मेरी…

जिससे ठोकर लगी मेरी,
एकाएक वो पत्थर बोला!
माना गिरे हो तुम,
मगर इतने भी नहीं गिरे हो तुम,
जो गिरते ही रहोगें हरदम।

Comments

17 responses to “जिससे ठोकर लगी मेरी…”

  1. वाह वाह, बहुत खूब

  2. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    हार्दिक धन्यवाद सर 🙏 शुभ रात्रि

  3. Rishi Kumar

    पत्थर भी हमें एहसास सिखा गया,
    लफ्जों में सही पर आंख दिखा गया|
    हे मानुष ! तुम मानुष हो संभल के चलना,
    वक्त मिले तो उसे उखाड़ कर ,उसे ही सबक सिखा देना||

    वह निर्जीव निर्दई है,
    वह कई राहियो का हत्यारा है,
    सबक ले लो ए जगत मुसाफिर,
    यह खुशियों का अंगारा है,||

    बहुत ही अच्छे वाक्य आपने कहा है
    बहुत-बहुत धन्यवाद🙏🙏🙏

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar

      बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ऋषि जी
      हार्दिक धन्यवाद 🙏

    2. वाह क्या बात, कवियों द्वारा एक दूसरे की कविताओं का सच्चा विश्लेषण किया जा रहा है, आनन्द की अनुभूति हो रही है।

  4. Geeta kumari

    पत्थर भी बोल गया,
    बातों बातों में तौल गया।
    कुछ राज़ अनकहे रहे,
    कुछ राज़ वो खोल गया।……..
    बहुत सुंदर प्रस्तुति

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      बहुत सुंदर मैडमजी
      बहुत बहुत धन्यवाद

      1. Geeta kumari

        🙏🙏

      1. Geeta kumari

        Thank you

  5. सुन्दर अभिव्यक्ति

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      धन्यवाद जी

  6. Pratima chaudhary

    बहुत सुंदर

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